मध्य प्रदेश में डॉक्टर भीमराव अंबेडकर कामधेनु योजना: पशुपालकों के लिए बनी वरदान
नीलिमा तिवारी
(गजानंद फीचर सेवा)
मध्य प्रदेश के ग्रामीण उद्योगों के उद्यम कृषि हैं, और कृषि की आत्मा छोटी है। प्रदेश के लाखों छोटे और औषधीय किसानों के लिए दूध, दुग्ध उत्पाद और पशुधन पर प्रतिबंध है। जब राज्य सरकार ने पशुपालकों की आर्थिक स्थिति पर चर्चा करने के उद्देश्य से डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर कामधेनु योजना की शुरुआत की, तो यह पहला चरण ग्रामीण विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ। यह योजना केवल पशुपालकों की आय बढ़ाने का माध्यम बनी है, बल्कि सामाजिक न्याय और आर्थिक धर्म की भावना को भी साकार कर रही है।
भारतीय संविधान के शिल्पकार डॉ. भीमराव बॅालम ने सामाजिक एवं आर्थिक हितैषी का जो सपना देखा था, उसी दृष्टि से इस योजना का नाम प्रस्तुत करते हुए उनका नाम रखा गया। योजना का मुख्य उद्देश्य प्रदेश के आधारभूत जाति वर्ग को शामिल करना है, जिसमें आर्थिक रूप से पिछड़े पशुपालकों को शामिल किया गया है, जो कि उद्यमों से जुड़े हुए हैं, उन्हें आधुनिक इकाइयों को स्थापित करने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है और ग्रामीण इलाकों में समूहों के रोजगार उपलब्ध कराए जाते हैं।
प्रदेश में दुग्ध उत्पादन की अपार सम्भावनाएं हैं, लेकिन क्षेत्र की कमी, तकनीकी जानकारी की कमी और बाजार तक सीमित पहुंच जैसी समस्याएं पशुपालकों के सामने चुनौती बनी हुई है। कामधेनु योजना इन कथाओं को दूर करने का स्टाम्प माध्यम उभरकर सामने आया है।
डॉक्टर भीमराव कामधेनु योजना के तहत पात्र हितग्राहियों को यूनिट स्थापित करने के लिए अनुदान और बैंक ऋण की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है। योजना के अंतर्गत 5, 10 या उससे अधिक दुधारू यूनिट की स्थापना का प्रोविजन है। इसमें ऑस्ट्रिया की खरीद, शेड निर्माण, चारा प्रबंधन और अन्य आवश्यक आवश्यकताओं के लिए आर्थिक सहायता दी जाती है।
डिजिटल हितग्राहियों को अनुदान (सब्सिडी) की सुविधा, बैंक ऋण पर आसान किश्तों में भुगतान, पशुपालन विभाग द्वारा तकनीकी मार्गदर्शन, टीकाकरण, बीमा और स्वास्थ्य जांच की व्यवस्था, दुग्ध संघों से परामर्श विपणन की सुविधा उपलब्ध करायी जाती है। इस प्रकार यह योजना केवल वित्तीय सहायता तक ही सीमित नहीं है, बल्कि संपूर्ण उद्यम प्रबंधन की एक समग्र व्यवस्था प्रदान करती है।
मध्य प्रदेश के कई चमत्कार- सीहोर, रायसेन, विदिशा, सागर, छतरपुर, रीवा, धार और मंदसौर में इस योजना के सकारात्मक परिणाम सामने आये हैं। जिन परिवार की मासिक आय सीमित थी, वे अब नियमित दुग्ध उत्पादन से स्थायी आय अर्जित कर रहे हैं। दूध से दैनिक लाभ वाली आय ने ग्रामीण परिवारों के जीवन स्तर में उल्लेखनीय सुधार किया है।
विशेष रूप से महिला स्व-सहायता समूह ने इस योजना का लाभ समूह व्यवसाय में अपनी उपस्थिति दर्ज की है। ग्रामीण महिलाओं के पास न तो केवल बेरोजगारी भत्ता है, बल्कि परिवार की आर्थिक धुरी भी बनी हुई है। इससे महिला संसथान को नई दिशा मिल जाती है।
योजना के माध्यम से आधुनिक नामकरण पद्धतियों को बढ़ावा दिया जा रहा है। पशुपालकों को औद्योगिक आहार, वैज्ञानिक दुग्ध उत्पाद, स्वच्छ दुग्ध दुहन तकनीक और पशु प्रबंधन स्वास्थ्य के बारे में प्रशिक्षण दिया जाता है। इससे दूध की गुणवत्ता और उत्पाद दोनों में वृद्धि हुई है।
आज कई में पक्के शेड, स्वचालित पानी की व्यवस्था, चारा काटने की मशीन और शीत श्रृंखला (कोल्ड चेन) जैसे मसाले देखने को मिल रही हैं। इससे दूध की ब्रेकरी कम हुई है और स्कूल में सुधार आया है।
इस योजना का सबसे महत्वपूर्ण गुण यह है कि यह समाज के ढांचे को आर्थिक ढांचे में लाने का प्रयास करता है, जिसे लंबे समय तक लागू करने की कमी को पीछे छोड़ दिया गया। जातीय वर्ग के हितग्राहियों को प्राथमिकता देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में यह योजना कारगर साबित हुई है।
डॉ. कॉम के सिद्धांतों के अनुसार, यह योजना केवल आर्थिक सहायता नहीं है, बल्कि क्रूज़ लाइफ़ जी का अवसर प्रदान करती है। बेरोजगारी और आय विकास के माध्यम से ग्रामीण समाज में समुदायों का भी विकास हुआ है।
मध्य प्रदेश से पहले ही देश के प्रमुख उत्पादक राज्यों में अपनी पहचान बना ली है। कामधेनु योजना की दिशा और गति इस प्रकार है। छोटे स्तर की इकाइयों के विस्तार से दुग्ध उत्पादन में निरंतर वृद्धि दर्ज की जा रही है। डेयरी संघों के माध्यम से संबद्ध विपणन ने किसानों को मूल्य निर्धारण में मदद की है।
दूध, घी, पनीर, दही और अन्य दुग्ध पदार्थों की मांग लगातार बढ़ रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित छोटे समूहों को अब स्थानीय उद्यमियों के सहयोग से शहरी उद्यमों की भी पूरी जरूरत है।
ग्रामीण युवाओं के लिए यह योजना रोजगार का नया माध्यम सामने आया है। जहां पहले रोजगार के अभाव में युवा शहरों की ओर पलायन कर रहे थे, वहीं अब वे अपने गांव में ही उद्यम व्यवसाय शुरू कर रहे हैं। इससे ग्रामीण संरचना मजबूत हुई है और सामाजिक संरचना भी बनी है।
एक वैज्ञानिक इकाई से केवल पशुपालक ही नहीं, बल्कि चारा व्यापारी, दूध संग्रहण केंद्र, परिवहन और विपणन से जुड़े लोग भी होते हैं। इस प्रकार यह योजना प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार के रोजगार उत्पन्न कर रही है।
से प्राप्त गोबर और गोमूत्र का उपयोग जैविक खाद के रूप में किया जा रहा है। इस प्रकार के रसायनिक पदार्थ पर आधारित एक रसायनिक पदार्थ बनाया गया है और मिट्टी की उर्वरता में सुधार किया गया है। कई स्थानों पर बायोगैस संयंत्र भी स्थापित किए गए हैं, जिससे ऊर्जा की आवश्यकता पूरी हो रही है और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिल रहा है।
हालाँकि योजना के परिणाम उत्साह वृद्धि हैं, फिर भी कुछ चुनौतियाँ सामने आती हैं। जैसे कि साकी की गुणवत्ता, चारे की अर्थव्यवस्था, समय पर ऋण उधार और बाजार मूल्य में उतार-चढ़ाव। इन पूर्वावलोकन से साक्षात्कार के लिए आवश्यक है। उन्नत नस्ल के समुद्री जीव, कैरेट विकास कार्यक्रम का विस्तार, डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से विपणन सुविधा, यदि इन लक्ष्यों पर सतत कार्य किया जाए, तो योजना और अधिक प्रभावी बन सकती है।
प्रदेश में सेक्टर सेक्टर को उद्योग के रूप में विकसित करने की अपार संभावनाएं हैं। यदि कामधेनु योजना को डेयरी इकाइयों, ब्रांडिंग और सहयोगियों से जोड़ा जाए, तो यह ग्रामीण समृद्धि का बड़ा आधार बन सकता है। साथ ही, पशुपालकों को प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता का निरंतर विस्तार इस योजना की सफलता को स्थायी स्थान पर रखता है।
डॉक्टर भीमराव कामधेनु योजना मध्य प्रदेश के पशुपालकों के लिए एक आभूषण सिद्ध हो रही है। यह योजना आर्थिक समानता, सामाजिक न्याय और ग्रामीण विकास के त्रिवेणी संगम का उदाहरण है। छोटे और प्रशिक्षित पशुपालकों को संयुक्त उद्यम से मिलकर यह पहली बार उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की राह पर है।
जब गांव दलित होगा, उसी प्रदेश का दलित होगा। और जब पशुपालक आत्मनिर्भर होंगे, सीमांत ग्रामीण मजबूत होंगे। डॉक्टर के सपने का भारत तभी साकार होगा, जब समाज का अंतिम व्यक्ति भी विकास की मुख्यधारा से जुड़ेगा। कामधेनु योजना इसी दिशा में एक मजबूत कदम है-जो पशुपालकों के जीवन में समृद्धि, सम्मान और सुविधा का नया अध्याय लिख रहा है।

