दादा-दादी की जगह पोते को भी मिल सकती है अनुकंपा नियुक्ति, सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा हाई कोर्ट का फैसला

 

रेलवे की याचिका खारिज, मृत कर्मचारी का पोता भी ‘निकट संबंधी’ के रूप में नियुक्ति का पात्र; मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने 30 दिन में नियुक्ति देने और 10 हजार रुपये मुकदमा खर्च देने का दिया था आदेश

नई दिल्ली। अनुकंपा नियुक्ति के मामले में पोते के अधिकार को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। मामला पश्चिम मध्य रेलवे की एक महिला कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसके पोते को अनुकंपा नियुक्ति देने से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और रेलवे की ओर से दाखिल याचिका खारिज करते हुए हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। इस फैसले में कहा गया था कि निर्धारित नियमों और शर्तों के तहत मृत कर्मचारी का पोता भी निकट संबंधी के रूप में अनुकंपा नियुक्ति पाने का पात्र हो सकता है।

न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने 28 सितंबर को यह आदेश दिया। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार की विशेष अनुमति याचिका खारिज करते हुए कहा कि हाई कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई उचित आधार नहीं है।

रेलवे ने पोते को नौकरी देने से किया था इनकार

यह मामला जितेंद्र वर्मा का है, जिन्होंने अपनी दादी छमा बाई की मृत्यु के बाद रेलवे में अनुकंपा नियुक्ति का दावा किया था। छमा बाई पश्चिम मध्य रेलवे के भोपाल मंडल में हेल्पर-2/खलासी के पद पर कार्यरत थीं। 19 जून 2016 को नौकरी के दौरान उनकी मृत्यु हो गई थी।

जितेंद्र के दादा की मृत्यु वर्ष 2002 में हो गई थी, जबकि उनके पिता का निधन 2006 में हुआ था। ऐसे में दादी छमा बाई ने ही उनका पालन-पोषण किया। परिवार की परिस्थितियों और दादी से उनके संबंधों को देखते हुए जितेंद्र ने उनकी मृत्यु के बाद अनुकंपा नियुक्ति की मांग की।

हालांकि, रेलवे ने उनके दावे को स्वीकार नहीं किया। इसके बाद मामला अदालत पहुंचा और नियुक्ति को लेकर कानूनी विवाद शुरू हो गया।

2007 में सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज था नाम

मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी सामने आया कि जितेंद्र का नाम वर्ष 2007 में ही छमा बाई के सर्विस रिकॉर्ड में उत्तराधिकारी/नामिनी के रूप में दर्ज हो चुका था। इसके बाद जितेंद्र ने 30 जनवरी 2018 को सिविल कोर्ट से उत्तराधिकार प्रमाणपत्र भी प्राप्त कर लिया था।

लेकिन रेलवे ने इस प्रमाणपत्र को सेवानिवृत्ति से संबंधित बकाया राशि के भुगतान तक सीमित माना। रेलवे का तर्क था कि इस प्रमाणपत्र के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति नहीं दी जा सकती।

दूसरी ओर, यह तथ्य विवादित नहीं था कि जितेंद्र परिवार का अकेला जीवित सदस्य था। उसने यह भी दावा किया कि वह छमा बाई का गोद लिया हुआ बेटा है। रेलवे ने गोद लेने की वैधता पर सवाल उठाते हुए उसका दावा खारिज कर दिया।

गोद लिया बेटा साबित नहीं हुआ, तब भी पोते का अधिकार

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान रेलवे की अनुकंपा नियुक्ति नीति के प्रावधानों पर विचार किया। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नीति के क्लॉज-3 में केवल पुत्र, पुत्री, विधवा या विधुर को ही नहीं, बल्कि निर्धारित शर्तों के अधीन निकट संबंधी और वैध रूप से गोद लिए गए पुत्र-पुत्री को भी नियुक्ति का लाभ देने का प्रावधान है।

अदालत ने कहा कि यदि जितेंद्र को छमा बाई का वैध दत्तक पुत्र नहीं माना जाता, तब भी वह उनके पोते होने के कारण नियमों के तहत निकट संबंधी की श्रेणी में आ सकता है। इसलिए केवल गोद लेने की वैधता पर सवाल उठाकर उसके दावे को खारिज नहीं किया जा सकता।

इस तरह हाई कोर्ट ने मामले को केवल दत्तक पुत्र होने या न होने तक सीमित रखने के बजाय रेलवे की नीति में निकट संबंधियों के लिए किए गए प्रावधानों के आधार पर भी विचार किया।

हाई कोर्ट ने 30 दिन में नियुक्ति देने का दिया था आदेश

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने 25 फरवरी 2026 को अपने फैसले में रेलवे को जितेंद्र के अनुकंपा नियुक्ति के दावे पर राहत देने का निर्देश दिया था। अदालत ने रेलवे द्वारा बार-बार दावा खारिज किए जाने पर भी आपत्ति जताई।

हाई कोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य मृत कर्मचारी के परिवार को कठिन परिस्थितियों में समय पर राहत देना है। यदि पात्रता से जुड़े नियमों के तहत किसी व्यक्ति के दावे पर विचार किया जा सकता है, तो उसे अनावश्यक रूप से लंबित रखना या बार-बार खारिज करना इस उद्देश्य के विपरीत है।

अदालत ने रेलवे को 30 दिन के भीतर अनुकंपा नियुक्ति देने का निर्देश दिया था। साथ ही, जितेंद्र को मुकदमे के खर्च के रूप में 10 हजार रुपये देने का भी आदेश दिया था।

रेलवे ने हाई कोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। हालांकि, शीर्ष अदालत ने याचिका खारिज कर दी और हाई कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

क्या हर पोते को मिल सकती है अनुकंपा नियुक्ति?

इस मामले का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अनुकंपा नियुक्ति के लिए पोते का दावा केवल रिश्ते के आधार पर स्वतः स्वीकार नहीं हो जाता। नियुक्ति संबंधित विभाग की नीति, उसमें निर्धारित पात्रता, निकट संबंधी की श्रेणी और अन्य आवश्यक शर्तों पर निर्भर करती है।

जितेंद्र वर्मा के मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने रेलवे की अनुकंपा नियुक्ति नीति के क्लॉज-3 के आधार पर उनके दावे पर विचार किया। सुप्रीम कोर्ट द्वारा रेलवे की चुनौती खारिज किए जाने से इस मामले में हाई कोर्ट का फैसला बरकरार रहा है।

इसलिए इस फैसले को हर परिस्थिति में सभी पोते-पोतियों को अनुकंपा नियुक्ति देने का सार्वभौमिक नियम नहीं माना जाना चाहिए। इसका लाभ संबंधित सेवा नियमों और मामले के तथ्यों के अनुरूप ही तय होगा।